Sindhu Khin Sanskruti Pdf Material

By | April 29, 2019

Sindhu Khin Sanskruti Pdf Material

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Sindhu Khin Sanskruti Learngujarat

સિંધુ ખીણની સંસ્કૃતિ

  • સમયગાળો : ઈ. પૂ. 2350-1750 ( C14પદ્ધતિના આધારે)
  • સૌપ્રથમ હડપ્પામાંથી આ સભ્યતાના અવશેષો મળ્યા હતા. આથી હળપ્પીય સબ્યતા તરીકે પણ ઓળખવામાં આવે છે.
  • ઈ.સ. 1826માં ચાર્લ્સ મેસન નામના વ્યક્તિએ સૌપ્રથમ આ સભ્યતા પર પ્રકાશ પાડ્યો ઈ.સ. 1856માં પંજાબમાં રેલ્વેના પાટા નાખતી વખતે જનરલકનિંગહામને આ સંસ્કૃતિના થોડા અંશે પુરાવા મળ્યા હતા.
  • સૌપ્રથમ મથક ઈ.સ. 1921માં પાકિસ્તાનના પંજાબ પ્રાંતમાંથી હડપ્પા મળ્યું.
  • ઈ.સ. 1922માં સર જ્હોન માર્શલના માર્ગદર્શન હેઠળ રખાલદાસ બેનરજી અને દયારામ સહાનીના પ્રયત્નોથી સિંધુ-પ્રાંતના લારખાના જિલ્લામાં મોહેં-જો-દડોમાં નગરીય અવશેષો મળી આવ્યા.
  • આ સભ્યતાનો ફેલાવો ઉત્તરમાં જમ્મુથી લઈને દક્ષિણમાં નર્મદા સુધી અને પશ્ચિમ બલુચિસ્તાનના મકરાન પ્રાંતથી લઈને ઉત્તર પૂર્વમાં મેરઠ સુધીનો હતો. સંપૂર્ણક્ષેત્ર ત્રિકોણ આકારમાં 12,99,600 ચો.કિ.મી.માં ફેલાયેલો છે.
  • આ સભ્યતાને આદ્ય ઐતિહાસિક (Protohistoric) અથવા કાંસ્યયુગિન સભ્યતાઓની શ્રેણીમાં ગણવામાં આવે છે.

सिन्धु घाटी की सभ्यता का उद्धभव काल में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में हुआ था, जो वर्तमान में।भारत, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अवस्थित है।

इस काल की सभी संस्कृतियों में सैन्धव सभ्यता सबसे विकसित, विस्तृत और उन्नत अवस्था में थी। इसे हड़प्पा सभ्यता (harappan civilization ) भी कहते है क्योंकि सर्वप्रथम 1921 ई. में हड़प्पा नामक स्थान से ही इस संस्कृति के सम्बन्ध में। जानकारी मिली थी।

सैन्धव सभ्यता अनुकूलता के मध्य उत्पन्न हुई थी जिसका ज्ञान उत्खनन एवं अनुसन्धान द्धारा होता है। सैन्धव सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी, क्योंकि इसके पुरातात्विक अवशेषों से परिवहन, व्यापार, तकनीकी, उत्पादन, एवं नियोजित नगर व्यवस्था के तत्व प्राप्त होते हैं।

मोहनजोदड़ो (Mohenjo-daro): जिसका सिंधी भाषा में आशय मृतको का टीला होता है, सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में स्थित सैन्धव सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से वृहत स्न्नानागार, अन्नागार के अवशेष, पुरोहित कि मूर्ती इत्यादि मिले है।

हड़प्पा (Harappa): यह पहला स्थान था, जहाँ से सैन्धव सभ्यता के सम्बन्ध में प्रथम जानकारी मिली।यह पाकिस्तान में पश्चिमी पंजाब प्रान्त के मांटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित है। अर्ध-औद्योगिक नगर’ कहा है।

चन्हूदड़ो (Chanhu-daro): यह सैन्धव नगर मोहनजोदड़ो से किलोमीटर दक्षिण में सिंध प्रान्त में ही स्थित था। इसकी खोज 1934 ई० में ऐन, जी, मजूमदार ने की तथा 1935 में मैके द्धारा यहाँ उत्खनन कराया गया। यहाँ के मनके बनाने का कारखाना, बटखरे।तथा कुछ उच्च कोटि की मुहरे मिली है। यही एक मात्र ऐसा सैन्धव स्थल है जो दुर्गीकृत नहीं है।

लोथल।(Lothal): यह नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में भोगवा नदी के किनारे स्तिथ है। जो महत्वपूर्ण सैन्धव स्थल तथा बंदरगाह नगर भी था। यहाँ से गोदी (Duckyard )के साक्ष्य मिले है लोथल में नगर का दो भागो में विभाजन होकर एक ही रक्षा प्राचीर से पूरे नगर को दुर्गीकृत किया गया है।

कालीबंगा (Kalibangan): कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ होता है काली रंग की चूड़ियां। यह सैन्धव नगर राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे स्तिथ है यहाँ के भवनों का निर्माण कच्ची ईंटो द्धारा हुआ था तथा यहाँ से अलंकृत ईंटो के साक्ष्य मिले है। जुते खेत, अग्निवेदिका, सेलखड़ी तथा मिटटी की मुहरे एवम मृदभांड यहाँ उत्त्खनन से प्राप्त हुए है।

सुत्कागेंडोर (Sutkagen dor): सैन्धव सभ्यता का यह सुदूर पश्चिमी स्थल पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्तिथ है।यह सैन्धव सभ्यता का पश्चिम में अंतिम बिंदु है। यहाँ से एक किले का साक्ष्य मिला है, जिसके चारो ओर रक्षा प्राचीर निर्मित थी।
बनावली (Banawali): हरियाणा के हिसार जिले में स्तिथ इस स्थल से कालीबंगा की तरह हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन, दोनों संस्कृतियों के अवशेष मिले है। यहाँ से अग्निवेदिया, लाजवर्दमनी, मनके, हल की आकृति, तिल सरसो का ढेर, अच्छे किस्म के जो, नालियों की विशिस्टता, तांबे के वाणाग्र आदि मिले है।

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